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क्या है शारदीय नवरात्रि का महत्व, क्यों की जाती है कलश स्थापना?

By Mani 4 min read


क्या है शारदीय नवरात्रि का महत्व, क्यों की जाती है कलश स्थापना? जानिए...आज से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो रही है. मां अम्बे को समर्पित नवरात्रि के त्योहार का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है.

22 सितम्बर सोमवार 2025/26

 शारदीय नवरात्रि आज यानी सोमवार से शुरू हो रहे हैं. नवरात्रि में प्रतिपदा के दिन घटस्थापना या कलश का पूजन होता है. शास्त्रों में इसका विशेष महत्व है. प्रतिपदा के साथ ही नवरात्रि में घट स्थापना होती है. इसका मुहूर्त भी होता है. शास्त्रानुसार सटीक मुहूर्त पर घट स्थापना से भक्त की सभी मनोकामनाएं फलित होती हैं और उसे पूजा का लाभ प्राप्त होता है. 

कलश पूजन क्यों: समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए इसमें अमरत्व की भावना भी रहती है. वे बताते हैं कि जल शांत चित्त प्रवृत्ति का होता है और पूजा अर्चना करते समय हमारा मन भी जल की तरह निर्मल और शांत होना चाहिए. यही कारण है कि घर के किसी भी शुभ अवसर पर घटस्थापना या कलश स्थापना की विधि सम्पन्न कराई जाती है.

नवरात्रों में घट स्थापना:

मान्यता है कि कलश में देवी-देवताओं, ग्रहों व नक्षत्रों का वास होता है और कलश को मंगल कार्य का प्रतीक माना गया है. कलश स्थापना करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. मान्यता है कि नवरात्रि में कलश स्थापना कर सभी शक्तियों को निमंत्रण दिया जाता है वो जब सभी शक्तियां आती हैं नकारात्मकता ऊर्जा नष्ट हो जाती है.

कलश पूजन की विधि:

 कलश पूजन की एक विधि है और उस विधि के अनुसार ही इसका पूजन होता है. घटस्थापना के दिन सबसे पहले कलश की स्थापना होती है और शास्त्रों में स्वर्ण कलश रजत कलश ताम्र कलश और मिट्टी के कलश का क्रमानुसार महत्व बताते हुए वर्णन किया गया है.

इन सब सामग्री से होता पूजन:

 कलश में सात तरह के धान, जिन्हें सप्तधान कहा जाता है, उनको रखा जाता है. कलश के अंदर इन धान को मिलाकर रखा जाता है. इन सब धान के ऊपर भी कलश को स्थापित किया जा सकता है. सप्तधान में जौ, तिल, कंगनी मूंग, चना, सावा होता है. इसके अलावा पंचरत्न जिसमें सोना, हीरा, नीलम का अंश भी कलश में रखना होता है. साथ ही पंच पल्लव यानी 5 तरह के पत्ते जिसमें बरगद, पीपल, आम, पाकड़ और गूलर के पत्ते कलश में नारियल के साथ रखे जाते हैं. इसके साथ ही सर्वे सप्तदीप वसुंधरा यानी सात दीपों और प्रमुख नदियों सात समुद्रों के जल का भी आह्वान उस कलश में किया जाता है.

सभी देवताओं का वास:

कलश को स्थापित करने के साथ ही भगवान वरुण का भी आह्वान किया जाता है, क्योंकि वह जल के देवता हैं और कलश में जल होता है. कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में भगवान शिव और मूल में ब्रह्मा का वास होता है. कलश के मध्य में देवियों का स्थान होता है. इसके अलावा चारों वेदों का भी कलश में आह्वान के जरिए स्थापना होती है. नवरात्रि में घट स्थापना में गणेश का पूजन और उसका महत्व तो है ही, लेकिन विधि अनुसार शास्त्रों में गृह प्रवेश में भी स्थापित होने वाले कलश की पूजा होती है.

क्या है नवरात्रि का अर्थ:

 नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है नौ रात्रि. इन नौ दिनों के दौरान शक्ति-देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है. ये नौ दिन श्री देवी भागवत अनुसार व्रत उपवास, तपस्या की समय अवधि है. नवरात्रि संसार की आदि-शक्ति मां दुर्गा का पावन पर्व समूह है. भारतीय संस्कृति में आराधना और साधना करने के लिए नवरात्रि पर्व सर्वश्रेष्ठ बताया गया है. नवरात्रि का पर्व उत्सव मात्र नहीं है. यह समस्त मानव जाति के लिए साधना द्वारा कुछ विशिष्ट उपलब्धि प्राप्त करने का सौभाग्यदायक अवसर है.

वर्ष भर में कितने नवरात्रि आते हैं:

 नववर्ष का प्रारंभ होता है. 12 महीनों में कुल चार नवरात्रि आते हैं :

चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रि क्यों महत्वपूर्ण:

वर्ष में चार नवरात्रि में चैत्र और आश्विन नवरात्रि का खास महत्व देवी पुराण देवी भागवत में मिलता है. शीत और ग्रीष्म दो ऋतुएं ही प्रमुख हैं. गर्मी का चैत्र से और शीत का आरंभ आश्विन मास से होता है. एक वर्ष में छः ऋतुएं मानी जाती हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार ऋतु परिवर्तन के इस संधिकाल का हमारे शरीर और स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है. शास्त्रकारों ने इस संधिकाल के मासों में शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए नौ दिनों तक विशेष व्रत नियम का पालन करने का विधान किया है. इसी विशिष्टता के कारण चैत्र एवं आश्विन मास के नवरात्रि पर्व प्रमुख होते हैं.नवरात्रि व्रत अनुष्ठान नौ दिन, सात्त दिन और पांच दिन तक और एक दिन तक भी कर सकते हैं. व्रत के दिन व्रती को फलाहारी अथवा एकाहारी होना चाहिए.

नौ दिनो तक व्रत उपवास के साथ दुर्गा सप्तशी पाठ. श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र पाठ देवीभागवत, देवीपुराण नर्वाण मंत्र जाप, नवाह्यन परायण आदि करने का विधान है.

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